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मेला माईसरखाना पर विशेष, 500 साल से आस्था का केंद्र

मौड़ मंडी (बठिंडा) हैप्पी जिंदल। उड़ान न्यूज़24।
-ऐतिहासिक पृष्टभूमि वाला मेला माईसरखाना
-रंग बिरंगी लाईटों और चांदी के साथ सजा मां का दरबार
-500 साल से आस्था का केंद्र बना है प्राचीन दुर्गा मंदिर
-हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, चंड़ीगढ़ के इलावा देश के दूसरे हिस्सों में से लाखों श्रद्धालु हुए नत्मस्तक
-मालवा के बठिंडा जिले के गांव माईसरखाना (मौड़ मंडी) मंदिर में लोगों की होती है हर मनोकामना पूरी
-हिंदू-सिख एकता का प्रतीक मेला माइसरखाना अस्सू व चैत्र के नवरात्रों दौरान छठे नवरात्रे को लगता है।
मालवा के बठिंडा जिले के गांव माईसरखाना (मौड़ मंडी) में नवरात्रों की छ_ वाले दिन लगने वाला माता माईसरखाना मेला रात 12 बजे ज्वाला जी ज्योति पूजन के साथ शुरू हो गया था। यह मेला 2/3 दिन तक चलता रहता है। हिंदू-सिख एकता का प्रतीक मेल माइसरखाना अस्सू व चैत्र के नवरात्रों दौरान छठे नवरात्रे को लगता है।इस दिन मेले में हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, चंड़ीगड़ के इलावा देश के दूसरे हिस्सों में से लाखों श्रद्धालुओं ने पंहुचकर मां ज्वाला जी की ज्योति के दर्शन किए और अपनी मनोकामना पूरी होने पर चौंकियां भरीं। नव विवाहित जोड़ी और नव जन्मे बच्चे की इच्छाएं पूरी होने पर भी अपनी मन्नत पूरी की। पंजाब महावीर दल के  कैप्टन  व पुजारी ने बताया कि प्राचीन दुर्गा मंदिर 500 सालो से आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां लाखों श्रद्धालुओं के दुख दूर हुए हैं। छटे नवरात्र का माईसरखाना में विशेष महत्व है। इस दिन प्राचीन दुर्ग मंदिर में ज्वाला मां की ज्योति का प्रवेश रहता है। इस दिन जो भक्त सच्चे मन के साथ माता जी के सामने कामना करता है उसकी हर इच्छा पूरी होती है। मेले दौरान मंदिर में बने तलाब में स्नान करने से रोग दूर होते हैं और नव जन्मे बच्चों की झंड उतरवाने की भी रीत है। मेले दौरान श्रद्धालुओं के रहने, खाने-पाने आदि का सारा प्रबंध समाजसेवी संस्थाओं की तरफ से किया गया है।

800 किलो चांदी के साथ सजा मां का दरवार, सुंदर लाइटों के साथ सजा मां के मंदिर का बाहरी दृश्य बना श्रद्धालूओं की खींच का केंद्र माता माईसरखाना मेले के दौरान जहां
माता का दरबार 800 किलो चांदी के साथ सजाया गया है वहीं माता के मंदिर का बाहरी दृश्य भी सुंदर लाइटों के साथ श्रद्धालूओं का मन मोह रहा था। रंग बिरंगी लाइटों के साथ सजे मंदिर के साथ- साथ सारा गांव का वातावरण सुंदर लग रहा था।
-सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध, डी.एस.पी और एस.एच.ओ मौड़ ने अपनी टीम के साथ रखी दिन रात चप्पे-चप्पे पर नजर: मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन की तरफ से पुख्ता प्रबंध किए हैं। इस दौरान डी.एस.पी ने बताया कि किसी भी शरारती अनसर को नहीं बखशा जाएगा और इसके इलावा मंदिर परिसर में लगे सी.सी.टी.वी कैमरे द्वारा चप्पे-चप्पे पर नजर रखी हुई है। यातायात को सही ढंग के साथ चलाने के लिए सभी दो पहिया/चार पहिया वाहनों और बसों को मेला स्थान से एक किलोमीटर पीछे ही रोका जा रहा है।

मैडीकल सेवाएं, श्रद्धालूओं के लिए लंगर मैडीकल सेवाओं के लिए हैल्थ डिपार्टमैंट द्वारा मैडीकल कैंप लगाए हैं और पीने के पानी के लिए नगर कौंसिल और मार्केट कमेटी की ड्यूटी लगाई है। इसके इलावा अलग-अलग समाज सेवी संस्थाओं द्वारा श्रद्धालूओं के लिए चाय, पानी, खाने के लिए विभिन्न लंगर लगाए गए हैं। विशेष तौर पर माता के नवरात्रे रखने वाले श्रद्धालओं के लिए भी लंगर का विशेष प्रबंध होता है।–इतिहास पौराणिक कथा मुताबिक माता ज्वाला जी के अपने भक्त कमालू को दर्शन देकर और उसके गांव के मंदिर में ही माता ज्वाला जी के आश्विन और चेत की छट को दर्शन देने के कारण ही यह मेला मशहूर हुआ है। ऐतिहासिक कथा मुताबिक सन १५१५ ई: में इस गांव का एक जिमींदार बाबा कमालू नथाना वाले बाबा कालू नाथ का चेला था। वह बाबा कालू नाथ जी के साथ हर साल ज्वाला जी हिमाचल प्रदेश दर्शन करने जाया करता था। बाबा कमालू ने बाबा कालू जी को कहा कि कितना अच्छा हो अगर माता जी का मेला मेरे गांव माईसरखाना में लगा करे।

बाबा कमालू हर रोज दूध लेकर नथानाबाबा कालू जी के पास जाता था। एक बार बाबा कालू नाथ ने बाबा कमालू का लाया दूध कोहडिय़ों को पीने के लिए दे दिया और बचा हुआ दूध उन्होंने बाबा कमालू को दे दिया। बाबा कमालू ने कोहडिय़ों के जूठे दूध की गिलानी मानकर सूखे जंड में गिरा दिया। दूध गिरने से वह जंड हरा भरा हो गया।
बाबा कालू ने बाबा कमालू को कहा कि पगले कमालू ये क्या किया? मैंने तो सभी रिद्धियां सिद्धियां तुझे इस दूध में घोल कर दी थीं। बाबा कालू के साथ बहुत नाराज हुए और अपनी समाधी में लीन हो गए। बाबा कमालू उदास होकर नथाना ही रहने लगे और बाबा जी की सेवा करने लगे। एक दिन बाबा कालू ने समाधी खोली और बाबा कालू को कहा कि जा भाग कर माईसरखाना के शमशानघाट में जा। वहां माता ज्वाला जी कोहडऩ के रूप में आई हुई है। इस बार कोई गलती न करना। बाबा कमालू उसी वक्त ही गांव माईसरखाना के शमशानघाट में पहुंचे और माता ज्वाला जी के पैर पकड़ लिए। माता जी ने बाबा कमालू को वर दिया कि मैं हर साल गांव माईसरखाना के मंदिर में दर्शन दिया करूंगी जो भी भक्त वहां आकर कोई भी सुख मांगेगा। उसकी सुख पूरी हुआ करेगी। तब से ही माईसरखाना का यह ऐतिहासिक मेला शुरू हुआ है। यहां हर आश्विन और चेत की छट को लाखों की संख्या में श्रद्धालू दर्शन करने आते हैं।

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